मुखौटों का संसार

उसकी तरह किसी खास समुदाय से संबंध रखने वालों के लिए लोगों ने उनकी भूमिका पहले से ही तय कर दी है किसी रहस्यमय पूर्वनिर्धारित प्रीप्रोग्रेम्ड कोडिंग के तहत, जिसकी जानकारी इतने अधिक गुप्त संस्तरों में कैद है कि जनसाधारण और जनमानस के अवचेतन में महज किसी धुंधली सी परछाई या फिर अस्पष्ट प्रतिध्वनियों के रूप में मौजूद है पर उसकी मौजूदगी की कोई तर्कसंगत व्याख्या या अवधारणा या प्रमाण दूर दूर तक ढूंढने से भी नजर नहीं आती और न ही इसकी कोई संभावना ही नजर आती है.

उन दोनों दुनियाओं के बीच खिंची अदृश्य सीमारेखा एक दूसरे को अपनी अपनी सीमारेखा का अतिक्रमण या उल्लंघन करने से रोकती है. सीमारेखा के उस पार पर मौजूद प्रहरी/लोग इस बात का खास ख्याल रखते हैं कि इन सबमें किसी प्रकार की कोई चूक या ढिलाई न होने पाए. सीमा के दूसरे पार के लोग अंदर खुदे खंदकों में बैठकर दूसरे के प्रति मेलप्रेम भाईचारा सहयोग जैसे सुंदर मीठे मधुर राग अलापते तो हैं, पर जैसे ही कोई उन सुमधुर धुनों के जादुई मोहपाश में बंध उनकी ओर कदम बढ़ाता है वैसे ही उनके खंदकों के अंदर कोई अदृश्य खतरे की घंटी तेजी से घनघनाने लगती है और थोड़ी ही देर में गोला बारी शुरू हो जाती है ताकि भूले से भी कोई उस सीमा रेखा के पार जाने का दुस्साहस न करे.

पर सीमा रेखा के इस पार रहने वाले (भोले भाले लोग, प्रकृति की गोद में बंधनहीन स्वछंद रूप से जीने वाले लोग) मजबूर बेबस लाचार लोगों का हुजूम झूठ छल प्रंपच की भाषा से अनभिज्ञ सहज ही दूसरी ओर वाले लोगों के बिछाए जाल में फ़ंस जाता है और उनके साजिशों और कुचक्रों का शिकार बन लांछित अपमानित होने के अलावा अपने इस कृत्य या दुष्कृत्य के लिए दंडित भी होता है. बदले में वो इस अन्यायपूर्ण व्यवहार के प्रतिकार या प्रतिरोध में न तो कोई आवाज ही उठा सकता है और न ही इसके खिलाफ़ कहीं पर जाकर फ़रियाद ही कर सकता है क्योंकि न्याय और दंड विधान संबंधी सभी अधिकारों पर दूसरे पक्ष का सर्वाधिकार सह्स्त्राब्दियों से सुरक्षित है. जिसे आसानी से चुनौती नहीं दी जा सकती.

पर बदलते वक्त के साथ दूसरे पक्ष को भी अपना बाह्य स्वरूप बदलना पड़ रहा है नहीं तो पुरातनपंथी पोगापंथी दकियानूसी और प्रतिक्रियावादी समझे जाने का खतरा मंडराने लगता है जिससे उनकी छवि को गहरा धक्का लग सकता है और काफ़ी क्षति भी पहुंच सकती है. इस के अलावा उनका अस्तित्व भी संदेहों के घेरों में घिर सकता है. ये छवि आज के अत्याधुनिक युग में पिछड़ेपन की निशानी साबित हो सकती है, सो इस से जितनी जल्दी पिंड छुड़ाया जा सके उतना ही अच्छा है. सो अपने अंतर्मन में आत्मग्लानि आत्मदया सरीखे बोधों को दबाए अपनी सड़ी गली मानसिकता पर प्रगतिशील मानवतावादी उदारवादी जैसे मुलम्मे चढ़ा लेते हैं ताकि उनकी वास्तविकता से कोई परिचित न होने सके.

तभी तो ये लोग वैयक्तिक रूप से दूसरे लोगों से तब तक जुड़े रहते है जब तक उनकी तरफ़ से कोई खतरा महसूस नहीं करते. उस वक्त वे उन लोगों के प्रति अपने सब से अच्छे व्यवहार का प्रदर्शन करते हैं ताकि कोई उनकी असलियत भांपकर उन का भंडाफ़ोड़ न कर बैठे. वे उन के सबसे बड़े हितैषी और शुभचिंतक होने का दावा करते है, और हर बात पर उन के साथ होने का दंभ भरते हैं और बात बात पर अपने बड़प्पन का प्रदर्शन करते हैं.

पर उनके दावों की पोल उसी वक्त खुल जाती है जब दूसरा अपनी पूर्वनिर्धारित भूमिका और रोल के परे जाकर अपनी पहचान या सत्ता स्थापित करने का प्रयास करता है. तब वे समवेत एक ही सुर अलापने लगते हैं और ऐन प्रकारेण उसी को हर बात के लिए दोषी और जिम्मेवार ठहराकर सजा का प्रावधान जारी करवाते हैं कि किस तरह समाज में ऐसे लोगों को अपमानित और दंडित करके उन की आने वाली पीढ़ियों तक को सबक दिया जाए ताकि भविष्य में कोई भी उनके सामने सिर उठाने या मुंह खोलने की जुर्रत न कर सके.

ऐसे लोगों के गहरी दोस्ती के दावों की पोलपट्टी उसी वक्त खुल जाती है जब वे दूसरों की परेशानियों में उनके साथ खड़े न होकर अन्यों की तरह दूर ही से उपदेश झाड़कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेते है और अपनी महानता के खोल में जाकर वापस छुप जाते हैं. डूबते हुए व्यक्ति को दूर दूर से मदद करने का आश्वासन तो देते है पर नदी में खुद कूदकर अपनी जान जोखिम में नहीं डालना चाहते और उसे अपनी ही आंखों के सामने मौत का ग्रास बनते देखते रहते हैं भर. बाद में शोक संवेदना की झड़ी लगाकर अपने विशाल ह्रदय संवेदनशील समझदार होने के ढोंग में सम्मिलित होते हैं क्योंकि खतरा तब तक सचमुच में टल चुका होता है.

क्रमश:

-उज्जवला ज्योति तिग्गा-

1 टिप्पणियाँ:

Bhushan ने कहा…

मानवीय संबंध मानवीय त्रासदियाँ भी हैं. सामाजिक वर्गीकरण प्राकृतिक संसाधनों की लूट का उत्पादन है. जातिवाद और धर्म उस लूट को स्थाई बनाने के साधन हैं. कानून भी वैसे बना लिए गए हैं कि न्याय के लिए गुंजाइश कम बचे. सिस्टम बदलने के आसार बन रहे हैं. हम मिल कर प्रार्थना कर सकते हैं.

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